Showing posts with label Childhood. Show all posts
Showing posts with label Childhood. Show all posts

Friday, 6 January 2017

बचपन



ज़िंदगी की कश़मकश़ ने हमें कुछ ऐसा उलझाया
मैं खुद को भूला, कुछ समझ न आया
इससे भला तो वो बचपन था
जब सही ग़लत कुछ मालूम न था
ज़िंदगी बनाते बनाते हम इतना आगे बढ़ गए
कि अपने पराए सब हमसे बिछड़ गए
अब याद आते हैं बचपन के वो खेल खिलौने
वो ज़िद, वो झगड़े, वो रोने धोने
क़ाश वो बचपन के दिन लौट आते
हँसते खेलते दिन कट जाते।